शशि पाधा जी के लिए लेखन भावों-अनुभावों से जूझना है। आप मूलत: कवयित्री हैं। हालाँकि गद्य-पद्य दोनों में ही समभाव सृजनरत हैं लेकिन कविता मन-प्राण में समाई रहती है। आप की रचनाओं का मूल स्वर प्रेम, सम्वेदना और देशप्रेम का है। मूलत: जम्मू की निवासी शशि जी की अब तक तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके हिन्दी काव्य संग्रह “अनन्त की ओर” को हिन्दीतर भाषी पुरस्कार मिल चुका है। अपने परिवार के साथ लम्बे समय से अमेरिका में रहते हुए भी आप हिन्दी भाषा व साहित्य से अगाध नेह रखती हैं। शशि जी नार्थ केरोलाईना विश्वविद्यालय में हिन्दी अध्यापन भी कर चुकी हैं। इस आत्मीय बातचीत में उनके व्यक्तित्व-कृतित्व के कई पहलू उजागर हुए हैं। विश्वास है कि दस्तक की साहित्य-संपादक ‘सुमन सिंह’ के साथ शशि पाधा जी की यह बातचीत उनके सुधी पाठकों और भविष्य के शोधार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।

– शशि जी, आपका बचपन पहाड़ों की गोद में बीता, प्रकृति अनन्य सहचरी रही आपकी कविताओं में वह नैसर्गिक सौन्दर्य और साहचर्य दिखता है आपकी स्मृतियों में बाल्यावस्था के वे दिन किस रूप में और कितने सुरक्षित हैं?

मेरा जन्म पर्वतों की गोद में बसे मन्दिरों के शहर जम्मू में हुआ था इस नगर के उत्तर में माँ वैष्णो देवी की पहाड़ी है। इस पहाड़ी के दर्शन हम प्रतिदिन सुबह उठते ही करते थे। जम्मू से कुछ ही मील दूर आरम्भ हो जाता है पहाड़ियों का नैसर्गिक सौन्दर्य हमारा ग्रीष्मकालीन अवकाश भी इन्ही पहाड़ियों में बसे किसी गाँव में बीतता था, जहाँ धुन्ध आकर हमें छिपा लेती थी, शीतल झरने गुनगुनाते थे और चीड़-देवदार के वृक्ष हमारे सहचर हो जाते थे। यही देखा और यही मन में बस गया। शायद वहीं से काव्य का बीज मन में अंकुरित हो गया। माता-पिता दोनों ही शिक्षक थे तथा साहित्य एवं संगीत में विशेष रुचि रखते थे। घर में सुबह संस्कृत के पावन श्लोक तथा शाम को आरती वन्दन के मधुर स्वर गूंजते थे। मुझे याद है, नगर में कभी भी कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता तो हम सपरिवार उसे देखने जाते थे। पिता और माता ‘आल इण्डिया रेडियो’, जम्मू के कई कार्यक्रमों में अपने विचार देते थे और भाई जम्मू रेडियो के सुप्रसिद्ध गायक थे। अत: मैं भी इस जम्मू रेडियो से बचपन से ही जुड़ गई। घर में भी हर महीने संगीत सभा अथवा काव्य संध्या का आयोजन होता था और हम हर आयु में उसमें भाग लेते थे। यह सब अब विशेष लगता है क्योंकि जीवन इतना तेजी से भाग रहा है। उन दिनों तो यही हमारी दिनचर्या थी। पुस्तकें, पत्रिकाएँ आसानी से उपलब्ध थीं तो पढ़ने का शौक भी बचपन से ही हो गया। स्कूल में भी हर सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लिया और कई पुरस्कार भी पाए। अब आँखें बंद करके जब भी अपने अतीत में लौटती हूँ तो लगता है कितने सुखद दिन थे वो!

– आपने लिखना कब शुरू किया?

शायद बचपन से ही। त्योहारों में खेल-खेल में गाने बनाकर सखियों संग कार्यक्रम प्रस्तुत करना मुझे अभी तक याद है। लेकिन पहली रचना एक कविता थी जो आठवीं कक्षा में रची थी, बस कच्ची-पक्की, फिर कॉलेज में पढ़ते हुए रेडियो के कार्यक्रम के लिए कहानियाँ भी लिखीं। वहीं से सिलसिला शुरू हुआ। सैनिक जीवन में कार्यक्रमों के लिए हास्य एकांकी या कव्वाली लिख दी। यह सब शौक तो थे लेकिन गम्भीर लेखन बहुत बाद में ही हुआ, यानी उम्र के चौथे दशक तक आते-आते।

– आपकी पहली प्रकाशित रचना कौन सी थी, जिसने निरन्तर सृजन को प्रेरित किया?

पहली प्रकाशित रचना तो कॉलेज की वार्षिक पत्रिका में लिखी एक कहानी थी, लेकिन सृजन को गति देने वाली पहली रचना मुझे कभी नहीं भूल सकती। कारगिल युद्ध अपने पूरे संहारिक रूप में ताण्डव कर रहा था। मन बहुत क्षुब्ध भी रहता था और सैनिकों के शौर्य और बलिदान को देखकर गर्व भी होता था। उन्हीं दिनों एक रचना लिखी थी जो एक प्रसिद्ध दैनिक समाचार पत्र ‘पंजाब केसरी’ के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी। शीर्षक था ‘हम लौटें कल या न लौटें’। इस रचना पर बहुत से पत्र मिले, प्रतिक्रियाएँ आईं तो बस लेखनी तीव्र गति से दौड़ने लगी। तब से जो चली, अभी तक यात्रा चल रही है।

– अमेरिका में जाने का संयोग कैसे बना?

सुमन जी, अमेरिका जाना और जाकर बसना मेरे लिए बहुत कष्टदायी निर्णय था। सैनिक पत्नी होने के नाते वैसे भी यायावरी जीवन ही व्यतीत किया। पति के सेवानिवृत होने पर सोचा था एक स्थान पर रहकर लेखन पर अधिक ध्यान दूँगी। किन्तु दोनों बेटे अमेरिका में पढ़ाई करके वहीं बस गए थे। परिवार के साथ रहने का मोह हमें यहाँ खींच लाया। शुरू में तो बहुत कठिन लगा, वैसे ही जैसे एक पेड़ को समूल उखाड़कर दूसरी जगह रोपने जैसा। अब अच्छा लगता है परिवार भी है और स्नेही मित्र भी। हाँ, देश की याद तो बहुत ही आती है।

– प्रवासवास ने आपके रचनात्मक मन को कितना प्रेरित-प्रभावित किया?

आरम्भ के दिनों में तो बहुत कठिनाइयाँ आईं। मैं लिखना चाहती थी, खूब पढ़ना भी चाहती थी किन्तु कहीं कोई हिन्दी की पत्रिका, पुस्तक नहीं मिलती थी। तब बहुत सी ऐसी रचनाएँ लिखी जिनमें देश से, घर से दूर रहने की पीड़ा ही शब्दबद्ध हुई। कुछ भी अपने जैसा नहीं लगता था, न प्रकृति, न लोग और न ही दृश्य इसीलिए मन भावुक अधिक रहता था। फिर उसी वातावरण में सौन्दर्य को ढूँढने का, नये रिश्ते बनाने का प्रयत्न किया। इसी तरह लेखन को विस्तार मिला, नई सोच भी मिली। मैं वर्ष 2002 में यहाँ आई थी। कुछ हिन्दी की पुस्तकें अपने साथ लाई थी। बार-बार उन्हें ही पढ़ती थी फिर धीरे-धीरे अन्तर्जाल पर आने वाली पत्रिकाओं से परिचय हुआ। सबसे पहले मुझे किसी मित्र ने अंतर्जाल पर हिन्दी में प्रकाशित होने वाली पहली पत्रिका ‘अभिव्यक्ति -अनुभूति’ का लिंक भेजा। मेरे लिए तो जैसे कुबेर का ख़जाना मिल गया। सच कहूँ तो देश से मीलों दूर अपने कम्प्यूटर पर हिन्दी की इतनी अच्छी पत्रिका को पढ़ पाना मेरे लिए डूबते को तिनके का सहारा जैसी बात थी। साथ ही उन दिनों मैं ‘नॉर्थ कैरोलिना’ राज्य के डरहम नगर में रह रही थी। वहाँ पर ‘हिन्दी विकास मण्डल’, ‘अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी समिति’ आदि संस्थाएँ हिन्दी के विकास-प्रचार में बहुत सक्रिय थीं। यूँ समझिए कि मुझे मित्र भी मिले और मंच भी मिला। यह संयोग ही था कि मेरा यहाँ बसे बहुत से लेखकों से मिलना-जुलना हुआ। यहाँ पर मासिक काव्य गोष्ठियाँ भी होती थीं, भारत से आए वरिष्ठ कवियों के लिए कवि सम्मेलनों का आयोजन भी होता था। इन सब गतिविधियों से मुझे प्रेरणा भी मिली और लेखन को गति भी। अमेरिका में हर राज्य में हिन्दी भाषा के प्रचार के लिए कई सम्मेलन-कार्यक्रम होते रहते हैं। मैं भी इन में भाग लेने का प्रयत्न करती हूँ। जब वातावरण मिला तो स्वाभाविक है कि लेखन भी प्रभावित-विस्तृत हुआ।

– आपने भारत में हिन्दी-संस्कृत और फिर अमेरिका में ‘चैपल हिल विश्वविद्यालय, नार्थ केरिलाइना’ में हिन्दी भाषा का अध्यापन कार्य किया, इससे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण अनुभव साझा करना चाहेंगी?

सुमन जी, दोनों अनुभव बहुत ही भिन्न थे। भारत में मैंने जम्मू के महिला कॉलेज में सबसे पहले हिन्दी और संस्कृत भाषा के अध्यापन का कार्य किया था। वहाँ पर अध्यापक के पास नियत पाठ्यक्रम होता है, पुस्तकें होती हैं, लाइब्रेरी होती है। सबसे बड़ी बात यह होती है कि विद्यार्थी को भाषा तो आती है, उन्हें केवल साहित्य की विभिन्न विधाओं से परिचित कराना होता है। अमेरिका में तो क्लास में 50 प्रतिशत विद्यार्थी हिन्दी भाषा के विषय में कुछ नहीं जानते। उन्हें वर्णमाला की सहायता से अक्षर ज्ञान कराना होता है। चित्रों की सहायता से वाक्य विन्यास सिखाना पड़ता है। यहाँ किसी भी विश्वविद्यालय में कोई निर्धारित कोर्स नहीं होता। आपको अपने अनुभव से, विभिन्न प्रशिक्षण सामग्री के माध्यम से भाषा का ज्ञान कराना होता है। केवल भाषा ही नहीं साथ-साथ भारतीय संस्कृति से भी परिचित कराना होता है, तभी तो विद्यार्थी भाषा से जुड़ेंगे, उसे अपनाएंगे। मुझे भारत में पढ़ाने और यहाँ पर पढ़ाने की टेक्निक में धरती आसमान का अन्तर लगा। एक चुनौती थी, जिसे निभाने में मैं जुट गई और बहुत ही आनन्द की अनुभूति हुई। वास्तव में हिन्दी है ही वैज्ञानिक भाषा। जो लिखा, वही पढ़ा-बोलो तो इस प्रकार भाषा का ज्ञान कराने में कोई कठिनाई नहीं हुई। मेरी कक्षा में विभिन्न देशों के विद्यार्थी थे। कई भारतीय मूल के थे, जिनके घर में हिन्दी बोली जाती थी, लेकिन वे पढ़-लिख नहीं सकते थे इसीलिए यहाँ पढ़ने आते थे। कुछ अमेरिकी, जापानी, और ब्रितानी विद्यार्थी भी थे जो भारत की संस्कृति से प्रभावित थे या भारत जाकर कोई व्यवसाय करना चाहते थे। वे बहुत ही मनोयोग से, मेहनत से सीखते थे और परीक्षा में अंक भी बहुत अच्छे लेते थे। इस प्रकार विभिन्न संस्कृतियों से आए विद्यार्थियों को पढ़ाने में बहुत आनन्द आता था। कुछ पारिवारिक कारणों से मुझे यह काम छोड़ना पड़ा नहीं तो मेरे लिए ये स्वर्णिम दिन थे।

– सैनिकों के शौर्य और बलिदान से सम्बन्धित आपकी कई रचनाएँ पढ़ने को मिलीं, इन रचनाओं को लिखने के मूल कारण क्या थे?

सुमन जी, मैंने अपने जीवन का अधिकांश भाग सैनिकों के साथ ही बिताया है। विवाह के बाद मैंने वही दुनिया देखी। सैनिक परिवारों का जीवन कुछ अलग-थलग होता है। मैंने उन्हें हर रूप, हर किरदार में देखा है। शौर्य, देश भक्ति, कर्तव्य परायणता, सद्भाव, मानव सेवा, यह सभी गुण उनमें सदैव विद्यमान रहते हैं। वो बागबानी भी उतनी ही तन्मयता से करते हैं जितनी लग्न से सीमा रक्षा। कोई सैनिक केवल घातक नहीं होता। राष्ट्र रक्षा उसका धर्म और कर्म होता है और इसके लिए वो शत्रु का संहार करता है। मैंने अपने सैनिक जीवन काल में युद्ध पर जाते हुए योद्धाओं को विदा किया है। शहीदों के परिवारों को सम्भाला भी है और आशंकाओं से जूझती हुई सैनिक पत्नियों के मन में उत्साह और भरोसा भरने का प्रयत्न भी किया है। रचनात्मकता तो स्वभाव में थी ही। जब ऐसी परिस्थितियाँ आईं तो कविता का रुख भी उस ओर ही मुड़ गया। कारगिल युद्ध में और उसके बाद कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों में मैंने बहुत से अपनों को खोया है। मैं उनके शौर्य और पराक्रम से अभिभूत भी हुई हूँ और उन्हें खोने के दु:ख से दुखी भी। मैंने यह भी देखा कि सैनिक तो एक बार युद्धक्षेत्र में वीरगति प्राप्त कर अमर हो जाता है किन्तु उसके परिवार के लिए जीवन युद्ध वहीं से आरम्भ होता है। कई प्रशासनिक सहायताओं के होते हुए भी परिवार का जीवन बदल जाता है। बस यही सोचकर मैंने अपनी लेखनी के द्वारा आम जनता तक सैनिकों की शौर्य गाथाओं के साथ-साथ उनके परिवारों के जीवन के विषय में भी आलेख- संस्मरण लिखने आरम्भ किए। इन्हें पुस्तक बद्ध रूप में प्रभात प्रकाशन ने प्रकाशित किया। इस संग्रह का नाम है ‘शौर्य गाथाएँ’। इच्छा यही है कि आज की युवा पीढ़ी इन वीरों की पराक्रम गाथाओं को पढ़ें और उनसे प्रेरणा पाएँ।

– आपकी रचनाओं में प्रेम की सुकोमल अभिव्यक्ति प्रधान है, इसका कोई विशेष कारण?

प्रेम में मेरी गहरी आस्था है। मुझे प्रकृति के क्रियाकलापों में, सूर्य के उदय-अस्त के सुनहरे दृश्य में, साँझ की ढलती चाँदी घुली आभा में, पुष्प के खिलने में, पवन का पत्तियों को छूने में, हर माँ की आँख में, धूप-छाँव की आँख-मिचौली में, प्रेम तत्व ही प्रधान दिखाई देता है। जब साहित्य पढ़ना-समझना आरम्भ किया सूर, मीरा, कबीर, जायसी की रचनाओं में प्रेम तत्व को पाकर अभिभूत हो गईे क्योंकि मैं स्वभाव से भावुक हूँ, अत: इसी प्रेम रस की स्याही में डूबी मेरी लेखनी से काव्य प्रस्फुटित हुआ। फिर सैनिक जीवन में भी संयोग और वियोग के बहुत से अवसर आए। इस प्रकार आरम्भ में जो भी लिखा, प्रेम ही लिखा। जीवन के इस मोड़ पर अब दृष्टी प्रेम से परे अन्य क्षेत्रों पर भी टिकती है। अब तो कविताओं में अन्य विषय भी समाहित हो गए हैं। किन्तु जब भी लिखने बैठती हूँ कविता का पहला अक्षर प्रेम ही लिखा जाता है। मेरी एक रचना भी है – ‘‘मानस के कागज पर प्रीतम दो अक्षर का गीत लिखा। पहला अक्षर नाम तुम्हारा, दूजा तेरी प्रीत लिखा।’’

– आपकी रचनाओं में जो छायावादी सौन्दर्य परिलक्षित होता है, वह किस कारण से है? क्या तत्कालीन छायावादी कवियों की रचनाओं का असर उन पर है?

जब बचपन से हिन्दी की रचनाएँ पढ़नी आरम्भ कीं तो महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रा नंदन पन्त, मैथिली शरण गुप्त, रामधारी दिनकर को पढ़ा। उससे पहले स्कूल की पढ़ाई में भी मुझे कबीर की रचनाएँ बहुत अधिक प्रभावित करतीं थी। कबीर के दोहे तो हमारे घर में हर परिस्थिति में एक दीपक के समान मार्गदर्शन करते थे। मुझे याद है कि मैंने जय शंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ को जितनी बार पढ़ा, हर बार उसमें कुछ नया ही ढूँढती रही। महादेवी जी के काव्य संग्रह पढ़कर मन अलौकिक संसार में विचरण करने लग जाता था। मैं उनकी पीड़ा के कारण को समझने का प्रयास करती थी और जो नहीं समझती थी वो अपनी विदूषी माँ से पूछती थी। शायद यही कारण है कि मेरी रचनाओं में छायावाद का प्रभाव आया। मुझे तो स्वयं इस बात का कभी भी पता नहीं चला। मेरे पहले काव्य संग्रह ‘पहली किरण’ के प्रकाशित होने के बाद पाठकों/समीक्षकों ने मुझे इस बात से परिचित कराया। हाँ, प्रकृति मेरी सहचरी है और वही मेरी लेखनी की नोंक पर बैठी मुझसे लिखवाती है। छायावाद और प्रकृति का विशेष सम्बन्ध है। अत: हो सकता है प्राकृतिक सौंदर्य को देखते-देखते मैं छायावाद की ओर मुड़ गई, किन्तु यह आनायास हुआ। मुझे स्वयं भी इसकी पदचाप सुनाई नहीं दी। सुमनजी, आप जब यह कहती हैं या कोई और पाठक मित्र यह कहता है कि मेरी रचनाओं में महादेवी जी की परछाईं है तो मुझे खुशी और हैरानी दोनों ही होती है। महादेवी जी की कालजयी लेखनी अगर मेरी प्रेरणा का स्रोत है तो यह मेरे लिए गर्व की बात है। हाँ, मैं नतमस्तक होकर यह अवश्य कहना चाहूँगी कि वो सागर हैं तो मैं एक बूँद ही हो सकती हूँ।

– आप कविता के साथ ही साथ गीत, नवगीत, दोहा हाइकु भी लिखती हैं, इस लेखन वैविध्य को इतनी कुशलता से कैसे निभा लेती हैं?

सुमन जी, रचनात्मकता तो एक काल्पनिक स्पन्दन है, उद्वेग है जिसे शब्दों में बाँध लिया जाता है। मैं आरम्भ में तो केवल गीत ही लिखती थी किन्तु धीरे-धीरे काव्य की अन्य विधाओं से परिचय हुआ तो इन्हें लिखने में आनन्द आने लगा। दोहे लिखने में मात्राओं का जो अनुशासन होता है वो मुझे चुनौती देता है। इसी प्रकार मैं ‘माहिया’ भी लिखती हूँ जो एक बहुत ही मधुर छन्दबद्ध रचना होती है। हाइकू लिखना भी कला ही है जिसे अभ्यास से परिष्कृत किया जा सकता है। नवगीत तो गीत ही है। केवल उसके कथ्य में आँचलिकता, लोकतत्व रहता हैे यह सब विधाएँ तो धीरे-धीरे लेखन में आई। इसके साथ ही मैं संस्मरण और आलेख भी लिखती हूँ। क्षणिकाएँ और लघुकथाएँ भी कुछ पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। यह सोचकर नहीं लिखती हूँ कि आज क्या लिखना है। मेरी कल्पना को उस समय जो भाता है उस विधा में लिख लेती हूँ। हाँ, एक बात अवश्य कहना चाहूँगी, बहुत सी रचनाएँ तो अन्य लेखकों की रचनाएँ पढ़कर, उनसे प्रेरित होकर लिखी हैं। नहीं तो कभी नहीं सोचा था कि गद्य में भी लिखूँगी। किन्तु अब लिखती हूँ तो अच्छा लगता है।

– आपकी लेखन के अतिरिक्त अन्य रुचियाँ?

पढ़ना और खूब पढ़ना। कुछ भी मिले, उसे पढ़ना। हाँ, सार्थक होना चाहिए। संगीत सुनना भी बहुत पसन्द है।

– समकालीन लेखकों में से किससे प्रेरित प्रभावित हैं?

जब बड़ी हो रही थी तो ‘शिवानी’ की रचनाओं से बहुत प्रभावित थी। उनके स्त्री पात्रों के चरित्र विश्लेषण ने मुग्ध कर दिया था। अब आप कहें कि कोई एक नाम लूँ तो निर्णय नहीं ले पाऊँगी। अंतर्जाल पर ही कितना साहित्य उपलब्ध है। बहुत लोग बहुत अच्छा लिख रहे हैं। जो अच्छा लगे पढ़ती हूँ और प्रेरित भी होती हूँ। कोई विशेष नाम नहीं ले सकती क्यूँकि विदेश में रहने से पुस्तकें तो कम ही उपलब्ध हैं।

– इन दिनों क्या व्यस्तता है?

सुमन आप तो जानती हैं, भारतीय सेना जम्मू-कश्मीर में किस प्रकार आतंकवाद से जूझ रही है। प्रतिदिन हम कितने वीरों को खो रहे हैं, कितने परिवार अनाथ हो रहे हैं। कुछ दिनों के लिए तो जनता उन्हें याद करती है लेकिन उसके बाद उनके परिवार अकेले पड़ जाते हैं अपने युद्ध से जूझने के लिए। मैं प्रयत्न कर रही हूँ कि उन रणबांकुरों की वीर गाथाओं के साथ-साथ उनके परिवार को भी सामने लाऊँ, उनसे मिलूँ, उनके बच्चों के भविष्य के विषय में जानूँ और अन्य लोगों तक उनकी जीवन गाथा पहुँचाऊँ । इसी प्रकार, परिवारों से मिलकर, फोन पर बात करके उनके विषय में लिखूँ। बस यह एक जीवन ध्येय बना लिया है। वैसे तो हम सब विश्व शान्ति की ही कामना करते हैं किन्तु जो हो रहा है उसे तो हम नजरअंदाज़ नहीं कर सकते। बाकी लेखन तो एक अनवरत यात्रा है, कई पड़ाव आएँगे देखिए, भविष्य की गठरी में मेरे लिए क्या-क्या है?