संसद में अविश्वास प्रस्ताव की जीत और उत्तर प्रदेश में ग्राउण्ड ब्रेकिंग सेरेमनी में 60000 करोड़ के निवेश से लबरेज उत्तर प्रदेश और केन्द्र की सरकार में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी अपने चुनावी एजेण्डे के साथ खुलकर मैदान में आ गई है। राजनैतिक लाभ को केन्द्र में रखते हुए नरेन्द्र मोदी लगातार विकास और निवेश को मुद्दा बनाकर अपनी उपलब्धियां जनता में पहुंचाने का पुरजोर प्रयास कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और राजनैतिक महत्व वाले प्रदेश में अपने पुराने रिकार्ड को पुन: कायम रखने के लिए मोदी हर संभव प्रयास कर रहे हैं। वो अलग बात है कि उनके विरोधी उनके तिलिस्माई नेतृत्व की चमक को विलुप्त होता बता रहे हैं। विपक्षियों के साथ-साथ उनके अपने दल भारतीय जनता पार्टी में भी अंदरखाने यह सुगबुगाहट आम है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए केवल मोदी के सहारे पूर्ण बहुमत पा पाना दूर की कौड़ी साबित हो सकता है। इसलिए जहां एक ओंर यह चर्चा आम है कि चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा चुनाव हो सकते हैं। वहीं दूसरा धड़ा चुनावों को आगे बढ़ाने के पक्ष में अपनी राय दे रहा है। हालांकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपने भाषणों में यह कहते घूम रहे हैं कि अविश्वास प्रस्ताव की जीत 2019 की भाजपा की जीत की एक झलक भर है। अमित शाह के भाषणों में आत्मविश्वास का कारण बंटे हुए विपक्ष का होना भी है। मोदी के राजनैतिक कद की बराबरी के लिए विपक्ष लामबंद होता तो दिख रहा है लेकिन मोदी की बराबरी करने वाला कोई करिश्माई व्यक्तित्व नजर नहीं आ रहा है। राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी अपने गैरजिम्मेदाराना रवैये के लिए विख्यात हैं ही, वे कब किस मुद्दे पर लीड लेंगे और कब अपनी बचकानी हरकतों से पूरे घटनाक्रम की गंभीरता को धराशाई कर देंगे इसका कोई भरोसा नहीं। इसलिए भारतीय जनता पार्टी राहुल गांधी को मुलायम चारा समझकर उनको उन्हीं के गलतबयानी के मुद्दों में फंसाकर उनकी हल्की छवि को ही बढ़ा-चढाकर प्रचारित करने में अपना लाभ देखती है। बाकी क्षेत्रीय दलों की अपनी-अपनी आकांक्षाएं-महत्वाकांक्षाएं हैं। उत्तर प्रदेश के युवा नेता अखिलेश यादव चाहते हैं कि विपक्ष का चेहरा उनके पिता मुलायम सिंह यादव को बनाया जाए तो मायावती अपने दलित दृष्टिकोण को ढाल बनाते हुए स्वयं को ही नेशनल लीडर साबित करने की फिराक में हैं। पश्चिम बंगाल की फायर ब्रांड मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का ध्यान अभी राज्य के चुनाव पर ही केन्द्रित है। लिहाजा वे केन्द्र से ज्यादा राज्य के चुनाव पर अपना ध्यान केन्द्रित रखना चाहती हैं। आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीसा जैसे प्रदेश के नेतृत्व केन्द्र में विपक्ष के सहयोगी दल तो हो सकते हैं लेकिन नेतृत्व की बागडोर पकड़ पाने में असमर्थ ही साबित होंगे। बिहार में नीतीश को जोड़कर और लालू को साइडलाइन करके उत्तर भारत का राजनैतिक मैदान भाजपा पहले ही काफी हद तक अपने पक्ष में कर चुकी है। अब देखना यह होगा कि देश में मंदी का असर और विकास के दावे करती भारतीय जनता पार्टी मतदाताओं को अपने पक्ष में रिझाने में कितना कामयाब होती है। बाकी हिन्दू-मुस्लिम, दलित-पिछड़ा के घालमेल की चासनी तो तैयार है ही। बस रिस्क इतना है कि कहीं अंतिम क्षणों में जातीय ध्रुवीकरण सत्ता पक्ष के अरमानों पर पानी न फेर दे। इसलिए जाति से कम धर्म से अधिक अपनी नैया पार लगाने की जुगत में बिसात बिछ चुकी हैं।