आशुतोष राणा

वे पूरे संसार के लिए आदरणीय होना चाहते थे किंतु ये बेहद मुश्किल काम था, तो भाईसाहब ने इसका एक तोड़ निकाला और कोर्ट में ऐफिडेविट देकर अपना नाम ही ‘आदरणीय भाईसाहब’ लिखवा दिया। तब से उनके मित्र हों या शत्रु सभी को उन्हें आदरणीय या भाईसाहब कहना पड़ता। भाईसाहब ने अपने नाम में रूमानियत पैदा करने के लिए एक पैंतरा और चला, वे अपने नाम आदरणीय भाईसाहब के साथ उर्फ़ में उसके इनिशल आ.भा.सा. लिखते, इससे उनके आदरणीय हो जाने की उत्कट अभिलाषा पूर्ण हो गई और वे संसार में आदरणीय भाईसाहब उर्फ़ ‘आभासा’ के नाम से ख्यात हो गए।
भाईसाहब नए-नए आस्तिक हुए थे, सो मंदिर कमेटी के अध्यक्ष बना दिए गए। इसलिए भयंकर उत्साह में थे। उन्होंने अपने घर में पूजा रखी थी। जिसका कार्ड मेरे घर आया था, मुझे सपरिवार अपने इष्ट मित्रों सहित बुलाया था। कार्ड में लिखा था की मोहल्ले के इतिहास में पहली बार अभी तक की सबसे बड़ी, सबसे शुद्ध, पूर्णत: वैदिक, प्राचीन ऋषि मुनियों द्वारा बताई गई प्रमाणिक विधि के अनुसार विशुद्ध शास्त्रोक्त “महा-महापूजा” का आयोजन हमारे निज निवास 7/स में सम्पन्न होने जा रहा है। आपको पधारना है। नीचे भाईसाहब की मुस्कुराती हुई ग्लोसी फ़ोटो के साथ पद और उनका नाम लिखा था..”अध्यक्ष मंदिर कमेटी” आदरणीय भाईसाहब उर्फ़ ‘आभासा’ और कार्ड के नीचे लाल अक्षरों में लिखा था – यदि आप सच्चे धार्मिक हैं तो अवश्य पधारेंगे।
मुझे ये निमंत्रण पत्र कम धमकी ज्यादा लग रहा था। जैसे अदालत ने समन भिजवाया हो। मैं एक हफ्ते बाद शहर में लौटा था। पत्नी से पूछा कि ये सब क्या है? तो वे थोड़ी असहज लगीं। फिर बिलकुल धीमी आवाज़ में बोलीं इतनी धीमी की दो फ़ुट की दूरी से भी मुझे उसका बोलना मुश्किल से सुनाई दे रहा था। मैंने कहा कि क्या हो गया तुम्हें, ऐसे क्यों बोल रही हो? अरे ये अपना घर है। थोड़ा ज़ोर से बोलो। पत्नी ने कमरे में इधर-उधर देखा कि कोई है तो नहीं! जबकि वहाँ हम दोनों के सिवा कोई और नहीं था। मैं बड़े चक्कर में पड़ गया। फिर पत्नी मिनमिनाती सी बोली भाईसाहब आस्तिक क्या हुए जीना दूभर हो गया। 4 दिन से भगवान जी की ठीक से पूजा नहीं कर पाई। मेरी सेहत बिगड़ रही है वो अलग। मोहल्ले में दो गुट बन गए हैं पुराने आस्तिक और नए आस्तिक। नए वाले सारे अत्याचार, अधर्म, बुराई की जड़ पुराने आस्तिकों की पूजा पद्धती को मानते हैं और पुराने वाले नयी पूजा पद्धति को गर्त में ले जाने वाला बता रहे हैं। घर से मंदिर तक अगर चप्पल पहन के जाओ तो लोग अधर्मी पापी कहकर धिक्कारते हैं। ठंड है, यदि स्वेटर या शाल ओढ़ ली तो ताने सुनने पड़ते हैं कि एक तरफ़ वो लोग हैं जो मायनस 20 डिग्री में हमारी सलामती के लिए खड़े हैं और एक ये हैं जो 10, 11 डिग्री में उनकी सलामती की प्रार्थना के लिए बिना स्वेटर के मंदिर नहीं जा सकते। मंदिर अब मंदिर नहीं, आस्था का अखाड़ा बन गया है। वहाँ अब पूजा नहीं सभाएँ हो रही हैं। पूजा पद्धति को लेकर चिंतन चल रहे हैं। आधे से ज्यादा पुजारी भी कहने लगे कि पुरानी पॉलिसी से उनको भगवान नहीं मिले इसलिए वो ठीक नहीं है। सो नया फ़ॉम्र्युला अप्लाई करो उसमें श्योरसाट गारंटी है। सुबह 7 बजे फूलवाला फूल ले के आता था। भाईसाहब ने उसको बहुत फटकारा की ये कोई समय है? इतना लेट आते हो अगर मोहल्ले में फूल देना है तो ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 3.30 बजे दो, वही शास्त्रीय समय है भगवान की पूजा का। धर्म भ्रष्ट करके रखा है तुम लोगों ने ..अब से ये सब नहीं चलेगा। सो बेचारा 3.30 पे आने लगा उसके पेट का सवाल था। एक दिन फूलवाले को और बुरी तरह डाँटा कि फूल जिसको पूजा करनी है उसके दरवाज़े पे नहीं लटकावोगे! उसके हाथ में दिया करो फूल अशुद्ध नहीं होने चाहिए और जिसके हाथ में दो उसने स्नान किया होना चाहिए। फिर उसी दिन शाम को पूरे मोहल्ले की मीटिंग बुलाई जिसमें सबका आना कंपलसरी था। मीटिंग में हम सबको पूरी पूजा पद्धति बताई कि आप सब लोग सुबह 3.30 बजे के पहले नहा धो के तैयार होंगे। फिर फूल लेंगे, ठीक 3.45 पे पूजा आरम्भ हो जानी चाहिए, घंटी जितनी ज़ोर से बजा सकें बजाएँ। घंटी एक किस्म की अलार्म क्लॉक है भगवान की, भगवान आप लोगों जैसे आलसी या टालू आदमी नहीं हैं कि आज का काम कल करें तब भी कोई हर्ज नहीं। उनको टाइम से जगाना हर भक्त का काम है। उनको नहलाओ-धुलाओ, तैयार करो फिर हर दिन के हिसाब से भोग बनाओ, ये नहीं कि रोज़ बताशा या चिरोंजीदाना चढ़ा दिया। आप लोग काम पे जाते हो तो टिफिन ले जाते हो के नहीं? भोग भगवान का टिफिन है। भगवान से आपको अपनी जो भी बात करनी है उसी तैयारी के दौरान कर लो उसके बाद वो काम पे जाएँगे, पूरी दुनिया उनको देखनी होती है। सिर्फ़ आप की ही समस्या नहीं है कि उनको पकड़ के बैठ गए। 4.15 बजे के बाद कोई मंदिर में दिखेगा नहीं चाहे सार्वजनिक मंदिर हो या आपके घर का। फिर 7 बजे से 7.15 तक उनकी आरती भोग प्रसादी, फिर अगली पूजा 9 बजे, फिर 11 बजे और फिर 1 बजे लंच टाइम, उसके बाद विश्राम 2 घंटे। 3 बजे उनको फिर उठाइए, उस समय दूध ही चढ़ेगा कुछ गरिष्ठ भोग नहीं। फिर 5 बजे स्नेक्स टाइप का भोग और 7 बजे डिनर विद शयन आरती। अगर 7 बजे के बाद किसी ने एक भी घंटी बजाई तो समझ ले उसकी ख़ैर नहीं है। धर्म का पूरा सिस्टम बिगाड़ा हुआ था, इसलिए चारों तरफ़ अधर्म का बोलबाला था। मोहल्ले में पिछली गलतियाँ जो हुई हैं जिसके कारण पूरे मोहल्ले को दुष्परिणाम भोगना पड़ा, उसको अब सुधार के सिस्टम में लाना है। अभी तक धर्म के नाम पे जो हो रहा था वह अधर्म था। गलतियाँ कुछ लोग करते थे और भोगना हम सबको पड़ता था। इसलिए धर्म को सिस्टोमेटिक करने के

लिए मुझे आप सबका साथ चाहिए।

मैं शुरू से ही आस्तिक हूँ। बस पेरी पूजा पद्धति बाकियों से अलग थी। अलग होना नास्तिक होना नहीं होता। लेकिन भुन्नू महाराज और छुन्नू महाराज ने मिलके मुझे नास्तिक सिद्ध कर दिया। ताकि धर्म के नाम पर ये लोग जो गोरखघंधा कर रहे हैं वो चलता रहे और ये लोग आप लोगों को लूट के ऐश करते रहें और हुआ भी वही। पूरा मोहल्ला नरक बन गया लेकिन छुन्नू और भुन्नू स्वर्ग के सुख भोगते रहे। इसलिए मुझे लगा कि मोहल्ले के कल्याण के लिए मुझे अपनी आस्तिकता की घोषणा करनी चाहिए। एतद मैंने अपने निज निवास द्वारिका सदन 7/स में “महा-महापूजा” का आयोजन रखा है। आप सभी को पधारना है। आपको विधिवत आमंत्रित किया जाएगा।
पत्नी बहुत खीजी हुई थी। मैंने कहा तुम परेशान मत हो, तुम घर में ही पूजा कर लिया करो। वो बोली तुमको जब कुछ पता नहीं है तो बोला मत करो, भाईसाहब ने पूरे मोहल्ले को नोटिस भेज दिया है कि सब लोग अपने-अपने भगवान मंदिर में जमा करें। अब से सब एक ही जगह पूजा किया करेंगे। आप लोग के द्वारा अलग-अलग पूजा किए जाने के कारण भगवान का कन्फ्यूजन बढ़ गया था जिससे वे कुछ लोगों के काम कर रहे थे और कुछ के नहीं। मोहल्ले में अमीर-गरीब सब हैं। अमीर भगवान को टाइम से न्यूट्रिशस भोग प्रसादी मिलने के कारण वे चुस्त तंदुरुस्त हो अमीरों को और अमीर कर रहे थे और दूसरी तरफ़ गरीब भगवान कुपोषण का शिकार हो अपनी क्षमता के हिसाब से काम नहीं कर पा रहे थे इसलिए गरीब और गरीब हो रहा था। परिणामस्वरूप गरीब का विश्वास भगवान पर से उठ गया था वो अराजक होने लगा था। इसलिए अब बिना भेदभाव के सबके भगवान एक ही मंदिर में रखे जाएँगे सबको एक सा भोग लगेगा सब चुस्त-दुरुस्त हो जाएँगे। भगवानों के बीच वर्ग भेद के मिटते ही हमारे बीच का भेदभाव भी ख़त्म हो जाएगा। इस पर भुन्नू और छुन्नू महाराज ने विरोध किया कि वर्षों कठोर, कड़ी तपस्या पूजा-अर्चना करके लोगों ने अपने अपने भगवान सिद्ध किए हैं उसका क्या? आप उनके भगवान को भी मंदिर में जप्त कर लेंगे? इस पर भाईसाहब के लोगों ने छुन्नू-भुन्नू की ख़ूब लानत मलानत की। उनको दूसरों के पुण्य को चुराने वाले पापी, सिद्धि चोर, अधर्मी, पाखण्डी मानवता का अहित चाहने वाले, धर्मद्रोही, चप्पल चोर, भिखारियों के भेष में छिपे हुए जेबकतरे। पता नहीं क्या-क्या कहा। भाईसाहब भी बोले कि आप लोग बताइए अगर इनकी पूजा पद्धति सही है तो फिर सब लोग सुखी क्यों नहीं हैं? सुख क्यों सिर्फ़ कुछ लोगों का दास बना हुआ है? भगवान ने जब ख़ुद सारी दुनिया बनाई है तो फिर इतनी असमानता क्यों? अगर मैं ग़लत कह रहा हूँ तो बोलिए!! ये छुन्नू-भुन्नू की साजिश का परिणाम है जो आज हमारे भगवान दूसरे मोहल्लों के भगवान की तुलना में इतने कमज़ोर हो गए। आज हमारे 65 भगवान बराबर दूसरे मोहल्ले का एक भगवान है। जबकि जब अपना मोहल्ला बना था उस समय हमारा एक भगवान दूसरे मोहल्ले के एक भगवान के बराबर था। हमारे पिछड़ने का कारण हमारी पूजा पद्धति रही है जिसे हमें अब बदलना है। सब लोग अपने-अपने भगवानों को मंदिर में जमा करें। मंदिर में सबके भगवानों के लिए एक खाँचा बनवाया जाएगा। आप आइए आपको 15 मिनट आपके भगवान के साथ बिताने की व्यवस्था बनेगी। आप अपने द्वारा सिद्ध किए भगवान की पूजा-अर्चना करो भोग लगाओ, उनको देखो और वापस मंदिर के खाँचे रखो और काम पर जाओ। यदि महा-महापूजा के बाद किसी के घर में भगवान दिखे और वो घर में पूजा करते पाया गया तो उसे कालीपूजा माना जाएगा और वह व्यक्ति धर्मचोर, धर्मद्रोही, मोहल्ले का अहित चाहने वाला क़रार दिया जाएगा। हम उसका जीना मुश्किल कर देंगे।
पत्नी ने बताया कि भाईसाहब के इस तूफ़ानी भाषण के बाद भाईसाहब के जयकारों से मंदिर का प्रांगण गूँज गया। मैंने देखा कि भगवान के मंदिर में लोग भगवान की जगह भाईसाहब की जय-जयकार कर रहे थे।
अगले दिन जब मैं भगवान के दर्शन करने के लिए मंदिर पहुँचा तो वहाँ का दृश्य देखकर दंग रह गया! मंदिर की चहारदीवारी से लेकर मुख्य द्वार तक भाईसाहब की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी हुई थीं कुछ में वे धनुष बाण पकड़े हुए थे तो कुछ तस्वीरों में वे शंख चक्रगदा पद्म धारण किए हुए थे, किसी में उनको पुष्प पर बैठे हुए तीन मुँह वाला दिखाया गया था तो किसी तस्वीर में वे बर्फ़ की चट्टानों के बीच ध्यानस्थ मुद्रा में बैठे हुए थे। भगवान की मूर्ति गर्भगृह में प्रतिष्ठित थी जो टिमटिमाते हुए दीपक की रोशनी में मुश्किल से दिखाई दे रही थी।
मैंने देखा कि दिया तेल न होने के कारण बुझने वाला है मैंने लपक कर दिए में तेल डाला ही था कि तभी नवनियुक्त प्रधान पुजारी गर्भगृह में दाखिल हुए और बेहद भावुक स्वर में मुझसे कहने लगे- तुमने देखा हमारे भगवान को भी यह अंधकार लील लेना चाहता है वो तो भला हो भाईसाहब का जिनकी आस्था और समर्पण के कारण भगवान अंधकार में नहीं समा रहे अन्यथा वे कब का लोप हो चुके होते। भाईसाहब हैं इसलिए भगवान बचे हुए हैं, इसलिए भगवान के लिए भाईसाहब का बने रहना बहुत ज़रूरी है। भगवान हमारी रक्षा करते हैं या नहीं ये विषय विवादास्पद है किंतु भाईसाहब भगवान के रक्षक है यह निर्विवाद रूप से स्थापित हो चुका था, इस सृष्टि का जन्मदाता भगवान है इस विचार पर द्वन्द हो सकता है किंतु भाईसाहब ने बहुत कुशलता से इस बात को सिद्ध कर दिया था कि इस सृष्टि ने ही भगवान को जन्म दिया है। भगवान के कारण भाईसाहब की प्रतिष्ठा नहीं है बल्कि भाईसाहब के कारण ही भगवान का अस्तित्व बचा हुआ है।
पुजारी जी ने प्रसाद में एक पेड़ा मुझे देते हुए कहा लो ये पेड़ा खाओ और मस्त रहो।
पेड़ा खाते ही मैंने भी भगवान के गर्भगृह में भगवान के सामने ही भाईसाहब के नाम का जयकारा लगाया, भाईसाहब के कल्याण की कामना की और घर की ओर चल दिया, पीछे से मुझे पुजारी के आशीर्वचन उच्च स्वर में सुनाई पड़ रहे थे कि भाईसाहब के कल्याण में ही भगवान का कल्याण है और भगवान के कल्याण में ही भक्त का कल्याण है।